eDiplomaMCU: सामान्‍य परिचर्चा

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Tuesday, May 28, 2024

संस्‍कृति का ह्रास अशिक्षा और आसामाजिक कारकों का प्रमुख कारण

पिछले वर्ष मैंने 'यूथ की आवाज़'  के लिए एक कंटेस्‍ट लेख लिखा था जिसमें मेरे लेख को विजेता की श्रेणी में चुना गया था। मेरे लेख का विषय था - इंटरनेट की छात्र जीवन में उपयोगिता और इसके नुकसान। मैंने उस लेख में इंटरनेट और इसके प्रयोग के विभिन्‍न पहलुओं पर चर्चा किया था। आज समाज में इंटरनेट की उपलब्‍धता आसान होने के बावजूद हम समाज को पतन की दिशा में जाते हुए देख रहे हैं। मुझे याद है जब मैं स्‍कूल में माध्‍यमिक स्‍तर में था तब से एक विषय काफी चर्चा का विषय रहता था, अमीर और अमीर होता जा रहा है जबकि गरीब और गरीब। इसके पीछे हम चर्चा तो करते थे परन्‍तु विषय का सार और रहस्‍य तब हमारी समझ के परे था। 

राजनीतिक रूप से हम समाज के खाई के बारे में चर्चा कर अपनी जिम्‍मेदारियों पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। जिन्‍हें कोई पद-प्रतिष्‍ठा यदि प्राप्‍त हो भी गई तो उसी का रौब दिखाने में उनकी जिन्‍दगी बीत जाती है और अमीर का और अमीर होना जबकि गरीब का और गरीब होना हम सबके लिए उसी प्रकार चर्चा का विषय बना रहता है जिस पर चर्चा करना तो पसंद होता है, परन्‍तु हम सब होते बेबस हैं। 

इस लेख के माध्‍यम से हम समाज के कुछ ऐसे बिन्‍दुओं पर चर्चा करने वाले हैं जिनकी अहमियत काफी है परन्‍तु हमारा उद्देश्‍य समस्‍याओं को दिखाकर किसी को कोसना नहीं है। सरकार, प्रशासन और जन सामान्‍य को खोई संस्‍कृति का पैमाना सामने रखकर ही बदलाव की शुरूआत करने की जद्दोजहद करनी होगी। 

आज आए दिन हम तरह - तरह के आपराधिक कृत्‍यों को देखते हैं। विभिन्‍न आपराधिक कृत्‍यों में नौयुवक/युवतियों की संलिप्‍तता चिन्‍ता का विषय बनी हुई है। ऐसे कृत्‍य अशिक्षा की वजह से बढ़ रहे हैं, इस बात को नकारा नहीं जा सकता। आज हमारी नई पीढ़ी शिक्षा से इतर जाकर मॉडर्नाइजेशन के नाम पर अभद्रता और व्‍यभिचार को सही ठहराने पर गर्व महसूस करती है। भारतीय संस्‍कृति एवं इसके मायने जो हमारे लिए आदर्श का काम करती आई है, आज लुप्‍त होने के कगार पर है। इंटरनेट के प्रयोग ने हमारी संस्‍कृति, सदाचार एवं इन मूल्‍यों की पहुँच को जन-जन तक पहुँचाने का काम किया है, परन्‍तु इसके विपरीत कुरीति, कदाचार, निम्‍न आचरण कई घरों में कब्‍जा करने में सफल रहा है। 

भारतीय संस्‍कृति और मूल्‍य के इतर युवा पीढ़ी का शिक्षा से विरत रहकर नशे की चपेट में आना और इन मनोविकृति परिस्थिति का साहित्‍य एवं समाज द्वारा आडम्‍बरभरी ग्‍लोरीफिकेशन ने भी भारतीय समाज के एक बड़े हिस्‍से को दयनीय परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। इन गतिविधियों में लिप्‍त अशिक्षित और अयोग्‍य लोगों का जुड़ाव अच्‍छे रोजगार से कदाचित ही हो पाता है और अंतत: बेरोजगारी एवं अण्‍डरएम्‍प्‍लॉयमेंट जैसी परिस्थितियां सामने आती हैं, जिसका सीधा फायदा राजनीतिक पार्टियों के साथ - साथ गुनाह की दुनिया से जुड़े लोगों द्वारा उठाया जाता है। समाज में सहिष्‍णुता का पतन इन्‍हीं कुप्रथाओं के प्रचलन के कारण प्रारम्‍भ हुआ है। ऐतिहासिक समय जिन्‍हें हम कुप्रथाओं के रूप में गिनते हैं उनका निदान हुआ है, परन्‍तु आज जिस द्रुत गति से इंटरनेट और मीडिया की मदद से समाज के एक बड़े हिस्‍से को भटकाया जा रहा है अथवा स्‍वयं उन बच्‍चों के अभिभावकों का समुचित नियंत्रण नहीं है, यह एक बड़ी चिन्‍ता का विषय है।

दोस्‍तों, मैंने शिक्षा एवं समाज सेवा के क्षेत्र में अथक प्रयास करते हुए बहुत लगन एवं मेहनत से काम किया है एवं पाया है कि नशा, इंटरनेट का दुरूपयोग, अपराध एवं अभद्रता का ग्‍लोरीफिकेशन ने समाज को पतन की दिशा में मोड़ दिया है जिसके परिणाम नजदीक भविष्‍य में अत्‍यंत भयावह होने वाले हैं। चन्‍द लोग हैं जिन्‍होंने भारतीय संस्‍कृति की परवाह की है एवं शिक्षा से जुड़कर एक बेहतर भविष्‍य की राह अपनाया है, परन्‍तु ऐसे चन्‍द लोगों को आज समाज में सकारात्‍मक परिवर्तन हेतु योगदान देने की अत्‍यंत आवश्‍यकता है। सरकार एवं प्रशासन की सुविधा पैसे वालों के लिए जिसका दुरूपयोग हम समय के साथ होता देखते आ रहे हैं, परन्‍तु हममें से सक्षम लोगों को भारतीय संस्‍कृति के पनरूस्‍थान के लिए वापस प्रयत्‍न करना होगा जिसका रास्‍ता धार्मिक उपदेशों, प्रवचनों आदि तक सीमित न होते हुए त्‍याग के रास्‍ते होकर शिक्षा एवं रोजगार के अवसर एवं तरीकों को जन-जन तक पहुँचाने का है। 

आज नशा के चलन ने कई युवाओं की जिन्‍दगियों को तबाह किया है, बचा-कुचा समय रील्‍स आदि और अभद्रता भरे कंटेट बर्बाद कर देते हैं। जो घर से सक्षम हैं और जायदाज में काफी कुछ पाये हैं उन्‍हें ज्‍यादा असर नहीं होता क्‍योंकि उनके पास वापसी का रास्‍ता होता है, दूसरी तरफ सामान्‍य परिवार के युवा ऐसी आदतों के चलते जिन्‍दगी का काफी सुनहरा वक्‍त गवां देते हैं।  

Monday, March 18, 2024

मोबाईल फोन का बच्‍चों पर बुरा असर, होम स्‍कूलिंग रहेगा चैलेंजिंग

समय के साथ शिक्षा के मायने बदल रहे हैं। यह बदलाव उद्योग जगत की मांग के साथ - साथ बच्‍चों को नए आयाम से जोड़ने का भी रहा है। कोरोना वायरस महामारी के बाद से हमने देखा है कि किस प्रकार विद्यालयों में पाठ्यक्रम को ऑनलाईन तरीके पर मोड़ा गया। इसके पश्‍चात् नई शिक्षा नीति ने भी दर्शा दिया कि इंडस्‍ट्री की मांग के अनुरूप ही शिक्षा पद्धति होनी चाहिए और बच्‍चों को उनकी रूचि के क्षेत्र में काम करने का मौका मिलना चाहिए। इन्‍हीं वजहों ने होम स्‍कूलिंग अर्थात् घर से शिक्षा के विचार को जन्‍म दिया है। भारत में तो होम स्‍कूलिंग उतना चलन में नहीं आया है परन्‍तु पश्चिमी कई देशों में होम स्‍कूलिंग को एक बेहतर शिक्षा पद्धति के रूप में देखा जा रहा है। 

भारत में भी आपने स्‍वयं एप्लिकेशन के माध्‍यम से होम स्‍कूलिंग के एक चेहरे को देख लिया है। भारत में उच्‍च शिक्षा में आपको ऑनलाईन सर्टिफिकेशन, डिग्रियां आदि देखने को मिल जाएगा, परन्‍तु स्‍कूल में होम स्‍कूलिंग के बारे में चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, परन्‍तु इसे मूर्त रूप कुछ वक्‍त बाद आप देख पाएंगे। होम स्‍कूलिंग प्रारम्‍भ किये जाने की मुख्‍य वजहों में से एक सुरक्षा करण भी है जो कई देशों में आतंकी हमलों से बच्‍चों की सुरक्षा के लिए पहल में लाया जा रहा है, वहीं अन्‍य वजहों में बच्‍चों को एक बेहतर वातावरण प्रदान करने का है जिसमें बच्‍चों के अभिभावक ही बच्‍चों को सकारात्‍मक परिवेश देने की पहल करेंगे, यह बिल्‍कुल वैसा ही होगा जैसा कि होम ट्यूशन देने वाले शिक्षक बच्‍चों की पढ़ाई में सहयोग करते हैं। 

होम स्‍कूलिंग के माध्‍यम से बच्‍चों में औद्योगिक कार्य की समझ बचपन से ही हो जाएगी क्‍योंकि उद्योग क्षेत्र के कार्य को बच्‍चे होम स्‍कूलिंग के माध्‍यम से बचपन से ही देखते आ रहे होंगे, इस प्रकार से बेरोजगारी दर में भी कमी आएगी। होम स्‍कूलिंग भी बच्‍चों के लिए मुश्किल भरा हो सकता है क्‍योंकि इसमें मोबाईल फोन, कम्‍प्‍यूटर आदि जैसे उपकरणों/तकनीकों का प्रयोग किया जाएगा। आजकल के अधिकांश बच्‍चे मोबाईल के दुर्पयोग के चपेट में आ चुके हैं, इसकी वजह न सिर्फ बच्‍चों द्वारा खुद की ऐसी समझ है बल्कि एडवर्टाइजमेंट एजेंसियों द्वारा किया जा रहा तरीका है जो अनुचित वेबसाईट्स पर बच्‍चों/यूजर्स को रिडायरेक्‍ट कर दिया करता है। बच्‍चे मोबाईल फोन का प्रयोग करके अपना बचपन खोते जा रहे हैं, गेम में पैसा लगाने से लेकर एडल्‍ट्री के दलदल से होते हुए समय बर्बादी के हर आयाम को छूते जा रहे हैं जो हर प्रकार से बच्‍चों के विकास पर लगाम लगाता है। 

सोशल मीडिया जैसे यूट्यूब, इंस्‍टा आदि के सदुपयोग के साथ - साथ दुरूपयोग अधिक हैं जो बच्‍चों पर आसानी से पकड़ बना लेते हैं। शॉर्ट्स का चलन इस कदर हावी हो चुका है कि बच्‍चे सदाचार, नैतिक मूल्‍यों से दूरी बनाकर अपनी शिक्षा से इतर उस दुनिया में चले जाते हैं जो उनके भविष्‍य के लिए घातक होता है। आज हर कोई यूट्यूबर, इंफ्लुएंशर बनने की होड़ में है, भले ही जानकारी और समझ के क्षेत्र में उनका स्‍तर नगण्‍य ही क्‍यों न हो। यह भावी बेरोजगारी के साथ - साथ नशे में लिप्‍त ऐसे समाज को जन्‍म दे रहा होता है जो आपराधिक प्रवृत्तियों को बढ़ाने में अहम रोल अदा करता है। 

बच्‍चों को अच्‍छा परिवेश प्रदान करना अभिभावकों के लिए अच्‍छा रहेगा परन्‍तु तकनीकि के दौर में सही दिशा दे पाना अभिभावकों के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है। अधिकांश बच्‍चे शिक्षा से दूर नशे आदि की चपेट में स्‍कूल की जिन्‍दगी से ही लग जाते हैं जिसमें स्‍कूल दोस्‍तों का सर्कल भी अहम रोल अदा करता है। अभी होम स्‍कूलिंग को शत प्रतिशत सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता, परन्‍तु वर्चुअल रोबोट आदि का डिजिटल शिक्षक के रूप में बच्‍चों के बीच आना भी उसी दिशा की तरफ एक इशारा है जो भविष्‍य में होने वाला है। होम स्‍कूलिंग भारत में एक पहल होगी जो अगले कई वर्षों तक शिक्षा के मायने बदल देगी।

Wednesday, September 20, 2023

पूँजीवाद, साम्‍यवाद तथा समाजवाद में अंतर : आसान शब्‍दों में

दोस्‍तों, क्‍या आप जानते हैं कि पूँजीवाद, साम्‍यवाद और समाजवाद में क्‍या अन्‍तर है? आए दिन आप सुनते होंगे कि अमेरिका पूँजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था है जबकि चीन-रूस आदि में साम्‍यवाद, तो वहीं भारत देश समाजवादी देश है। भारत में भी 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा संविधान के प्रस्‍तावना में समाजवाद शब्‍द जोड़ा गया, साथ ही भारत के नीति-निदेशक तत्‍वों को देखें तो आप समझ पाएंगे कि भारत का संविधान भारत को एक समाजवादी देश बनने की ओर इंगित करता है। साथ ही हम बात करेंगे कि समाजवाद शब्‍द की आड़ में किस प्रकार वोट बैंक की राजनीति ने भारत देश की हालात को बिगाड़ा है। 

पूँजीवाद - इस प्रकार की अर्थव्‍यवस्‍था में प्रत्‍येक व्‍यक्ति/कम्‍पनी को अधिक धन खुले बाज़ार से कमाने की छूट होती है। साथ ही साथ उस उपक्रम द्वारा कमाये गये प्रत्‍येक वस्‍तु/धन पर एकाधिकार उस व्‍यक्ति/कम्‍पनी का ही होता है। इस प्रकार समाज में एक फासला तो बना रहता है परन्‍तु किसी के भी मेहनत का हिस्‍सा काटकर अन्‍य संवर्ग को ऊपर उठाने का प्रयास इसमें नहीं होता है। इसमें व्‍यक्ति द्वारा आगे बढ़ने और मेहनत करने की ललक रहती है क्‍योंकि उसे उसकी मेहनत का ईनाम प्राप्‍त होता है। इस सिलसिले में अक्‍सर मालिक वर्ग पूँजीवादी अमीर जबकि मजदूर वर्ग शोषित होता है। औद्योगिक क्रांति के जन्‍म के साथ ही पूँजीवाद चरम पर आ गया और मज़दूर वर्ग को अन्‍य विकल्‍प जैसे साम्‍यवाद सोचने पर मज़बूर कर दिया। 

साम्‍यवाद - साम्‍यवाद एक ऐसी विचारधारा का नाम है जिसमें न किसी राज्‍य की कोई सीमा हो और उसमें रहने वाले लोग किसी सम्‍पत्ति के मालिक न हों, बल्कि वह सम्‍पत्ति सबकी हो। कार्य सभी करें और यदि उपभोग की बात हो तो चाहे वह गरीब हो या अमीर, किसी भी जाति वर्ग का हो, उसे ऊपर उठकर एकरूपता को अपनाना होगा। साम्‍यवाद में कोई शासक वर्ग नहीं होता, बल्कि नियंत्रक के तौर पर एक राज्‍य होता है, उस राज्‍य में नेतृत्‍वकर्ता साम्‍यवादी विचारधारा का होना ज़रूरी है, परन्‍तु वास्‍तविकता में यह छद्म साम्‍यवाद को दर्शित करता है, क्‍योंकि छोटे स्‍तर पर तो साम्‍यवाद दिखता है, परन्‍तु बड़े वर्ग, अथवा किसी बड़े देश विशेष की बात करें तो साम्‍यवाद भी एक प्रकार का छद्म पूंजीवाद की तरह दिखता है जिसमें एक वर्ग समाज के अन्‍य बड़े वर्ग को साम्‍यवाद के नाम पर ठग रहा होता है, अथवा उसके अधिकारों का हनन कर रहा होता है। रूस के स्‍टेलिन ने भी साम्‍यवाद के नाम पर ही पूँजीवाद से बदतर हालात को जन्‍म दिया जिसमें हज़ारों की तादात में भुखमरी के कारण आमजन की मृत्‍यु तक हो गई थी। साम्‍यवाद के इतिहास को यदि ज़मीनी स्‍तर पर देखा जाए तो माओ-जेदांग जैसे नेताओं ने हिंसा को साम्‍यवाद लागू कराने का सबसे अच्‍छा तरीका अपनाया था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध में पूँजीवाद और साम्‍यवाद के मध्‍य असल में युद्ध हुआ था जिसमें वैचारिक भिन्‍नता रखने वाले लोगों ने अपनी जाने खो दी।

समाजवाद - समाजवाद एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जो पूँजीवाद और साम्‍यवाद का संक्रमण बिन्‍दु है। समाजवाद में पूँजीवाद का विरोध नहीं किया जाता परन्‍तु ऊपर से ही पैसा/धन आदि लेकर निम्‍न संवर्ग को उसका लाभ दिया जाता है। समाजवाद और कल्‍याणकारी योजनाओं में अन्‍तर बहुत बारीक है, क्‍योंकि समाजवाद में समुदाय के उन संवर्गों को बिना मेहनत या योगदान लाभ दिया जाता है जो असल में उसे हासिल नहीं कर सकते अथवा उसे हासिल न कर पाएंगे ऐसा दिखावा कर सकते हैं। भारत देश एवं विभिन्‍न राज्‍यों में सरकार द्वारा चलायी जा रही कल्‍याणकारी योजनाओं में तथा समाजवाद के नाम पर वोट बैंक के लिए बॉंटी जा रही मुफ्त की चीजों के बीच अन्‍तर कर पाना बड़ा मुश्किल है। समाजवाद किसी भी देश में रह रहे लोगों के लिए कल्‍याणकारी होता है क्‍योंकि जो तबका असहायता भरी जिन्‍दगी जी रहा होता है, उसे ऊपर स्‍तर के लोगों से धन (टैक्‍स आदि के रूप में) प्राप्‍त करके निम्‍न तबके में बॉंट दिया जाता है। 

दूसरी तरफ, समाजवाद राष्‍ट्र के पतन को भी जन्‍म दे सकता है, क्‍योंकि मुफ्त की चीजें पाने वाले संवर्ग मेहनत न करना चाहेंगे, और मेहनती संवर्ग को उनके मेहनत का फल न मिल पाने के कारण कम मेहनत करना शुरू कर देंगे। भारत में समाजवाद का दंश सबसे अधिक निम्‍न-मध्‍यमवर्गीय परिवार झेल रहा है। समाजवाद एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जो निम्‍न वर्ग को मेहनत नहीं करने देती है और न ही निम्‍न-मध्‍यमवर्गीय परिवार को आगे बढ़ने देती है। कल्‍याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट बैंक की राजनीति चरम पर है जिसका परिणाम देश की जनता महंगाई, बेरोजगारी, अपराध के बढ़ते आंकड़ो आदि के माध्‍यम द्वारा देखी जा सकती है। समाजवाद के नाम पर चल रही योजनाओं का क्रियान्‍वयन कराने वाले राजनेता/ब्‍यूरोक्रेट्स आदि भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त दिखते हैं और आए दिन आमजनता के भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता जाता है। 

समाजवाद एक प्रकार का साम्‍यवाद ही है, समाजवाद में सरकार लोकतांत्रिक तो होती है, परन्‍तु समाजवाद के नाम पर वोट बैंक की राजनीति साम्‍यवाद की तरह ही होती है जिसमें जनता के मेहनत के टैक्‍स का रूपये भ्रष्‍टाचार आदि में बर्बाद कर दिया जाता है। समाजवाद के नाम पर देश की जनता को दिया जा रहा धोखा इस बात की ओर भी इशारा करता है कि किस प्रकार सरकारी विद्यालयों का पतन होता जा रहा है अथवा सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्‍तर गिरता जा रहा है, यहां तक कि सरकारी विभागों में कार्यरत अधिकारी/कर्मचारी स्‍वयं अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूल में पढ़वाना पसंद नहीं करते। दूसरी तरफ सरकारी अस्‍पताओं की हालात की जर्जर है, सुविधा की कमी है। मध्‍यम एवं उच्‍च संवर्ग प्रायवेट शिक्षा एवं स्‍वास्‍थ ग्रहण करना चाहेंगे, परन्‍तु निम्‍न एवं मध्‍यमवर्ग को इसी समाजवाद के नाम पर धोखा दिया जाता रहा है। 

व्‍यवस्‍था चाहे कोई भी रहे, पूँजीवाद, साम्‍यवाद अथवा समाजवाद; यह व्‍यक्ति और समाज की नैतिक जिम्‍मेदारी है कि नैतिक मूल्‍यों की शिक्षा नई पीढी को दी जाए, साथ ही साथ भ्रष्‍टाचार का खात्‍मा होना भी देश की तरक्‍की के लिए सहायक होगा। मुफ्त में यदि कोई वस्‍तु मिले तो सिर्फ शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य, क्‍योंकि मुफ्त में मिलने वाली चाजें भी किसी से छीनकर ही बॉंटी जाती हैं। इस प्रकार हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही ग़रीबी हटाओ का नारा देने वाले राजनेता ग़रीबी हटाने के नाम पर समाजवाद के आड़ तले देश को अवनति के रास्‍ते ले जाते रहे हैं।  

Wednesday, June 7, 2023

पर्यावरण संरक्षण आडम्‍बर मात्र तक सीमित : किसी के शौक तो किसी की मज़बूरी

विश्‍व पर्यावरण दिवस का नाम आते ही 5 जून की याद आती है, और जब 5 जून ही हो तो इसके नाम से शिविर का आयोजन, जागरूकता कार्यक्रम किया जाना स्‍वाभाविक हो जाता है। सन् 1973 से पर्यावरण दिवस प्रत्‍येक वर्ष 5 जून को दुनिया भर के देशों में मनाया जाने लगा है। इस वर्ष 2023 में 5 जून को विश्‍व पर्यावरण दिवस की 50वीं वर्षगॉंठ मनाई गई। मैं भी प्रत्‍येक वर्ष कुछ शिविरों को सुनता हूँ तो कई बार लेख पढ़ता रहता हूँ। परन्‍तु एक बात हमेशा विचार में आती है कि आखिर विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाते हुए 50 वर्ष होने को आए हैं, चाहे वह लोकल स्‍तर पर हो, राष्‍ट्रीय अथवा अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर हो, पर्यावरण सूचकांक में भारत का स्‍तर दिन-ब-दिन गिरता ही जा रहा है। इस लेख मैं मैं उन कुछ ज़मीनी कारणों की भी चर्चा करूँगा जो पर्यावरण संतुलन को प्रभावित करते हैं। यह लेख उन लोगों के लिए भी एक आईना है जो सिर्फ शिविरों और आयोजनों में प्रायोजित दिखावे के तहत पर्यावरण का मज़ाक बना कर रख दिये हैं।

मैं एक बार पर्यावरण संरक्षण दिवस 5 जून के मौके पर एक शिविर में था, जहॉं वक्‍ता वह लोग थे जिनको सारी सुख-सुविधाऍं मिलती हैं। समझ नहीं आता कि उन लोगों का वक्‍तव्‍य सुनो तो लगता है कि वृक्षारोपण ही पर्यावरण संरक्षण का एकमात्र उपाय है, अथवा यदि कोई अधिक स्‍तर तक सोच पाया तो गाड़ी न चलाकर पेट्रोल की बचत करो अथवा ऐसे वक्‍त पंखा मत चलाओ जब ज़रूरत न हो। मैं ऐसे कई मौकों पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति चिंतनीय समारोह में सम्मिलित हुआ और पाया कि 99 प्रतिशत मौकों पर वृक्षारोपण के आडम्‍बर तले पर्यावरण एवं इसके संरक्षण के महत्‍व को कमतर ऑंक लिया जाता है। भला पर्यावरण का सम्‍बंध सिर्फ वृक्षों से थोड़ी न है जिसके अधिकाधिक रोपण से उन समस्‍याओं का भी समाधान हो जाएगा जो समस्‍याऍं हम मानव प्रकृति को देते हैं। 

पर्यावरण संरक्षण दिवस के अवसर पर वक्‍ताओं के अभिभाषण सुनने से यह साफ हो जाता है कि उनका बौद्धिक स्‍तर कितना विकसित है जो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ऐसे तर्क आगे रखते हैं जो आजकल मानव समाज का हिस्‍सा बन गया है। भला कोई बोले कि यदि आपको बाज़ार से काई सामान खरीदना हो तो पैदल निकल लो और इससे पर्यावरण का संरक्षण हो जाएगा, दूसरी तरफ मानव समाज के इस तबके द्वारा बहुतायत में एयर कण्‍डीशनर, फ्रीज, आदि ऐसी चीजों का धड़ल्‍ले से प्रयोग होता है। भला अब फ्रीज, एसी और ऐसी उन चीजों का विरोध हो जाएगा कि हम प्रकृति द्वारा प्रदाय वातावरण के शय में काम करेंगे और सोऍंगे जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाती हो। समाज का हर तबका आज इसी आडम्‍बर के तहत पर्यावरण संरक्षक के महत्‍व को मज़ाक बना दिया है।

भला यह शिक्षा के स्‍तर को ही व्‍यक्‍त करता है कि हम इतने स्‍वार्थी हो गये हैं कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर फोटो, सेल्‍फी आदि को बढ़ावा दे रहे हैं और यह ख़बर उन तक चलती है जो मज़बूरी में जी रहे होते हैं, आर्थिक तंगी और घर की गरीबी में उनके घर में जीवन-यापन का सहारा कच्‍चा घर, फ्रीज के नाम पर घड़ा और एसी के नाम पर पेड़ की छॉंव और घर का ऑंगन होता है। शिविरों और आयोजनों में इन्‍हीं लागों को उपदेश दिया जाता है जिनकी हैसियत कोई बड़ी कार, एसी आदि लेने की नहीं है। दूसरी तरफ जो पर्यावरण प्रदूषण में अन्‍य वजहें भी हैं उन्‍हें भ्रष्‍टाचार आदि की वजह से कभी भी बन्‍द नहीं किया जाता है।

यदि पर्यावरण के प्रति लोग इतने ही चिंतित होते हो पर्यावरण प्रदूषण के सभी आयामों की चर्चा करते। पॉलीथीन का प्रयोग धड़ल्‍ले से हो रहा है और यह पॉलीथीन अकेले उन सभी पर्यावरण खतरों से बढ़कर है जो आमतौर पर पर्यावरण प्रदूषण के एक आयाम तहत देखा जाता है। आज बाज़ार से लेकर घर के प्रत्‍येक काम में पॉलीथीन का प्रयोग बेझिझक हो रहा है। पॉलीथीन बैन होने के बाद भी जिम्‍मेदारान लोग जो पर्यावरण संरक्षण में अभिभाषण देते नज़र आ जाएगें, पॉलीथीन के प्रयोग करने से नहीं कतराते। वहीं कई बार हमने देखा है कि पॉलीथीन का प्रयोग करने के बाद इसे यहॉं-वहॉं कहीं भी लोगों द्वारा फेंक दिया जाता है जिससे मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि तरह के प्रदूषण होते हैं। यह अज़ीब बात है कि पर्यावरण संरक्षण का उपदेश उन लोगों द्वारा दिया जाता है जो पर्यावरण को भारी तरह से नुकसान पहुँचाते हैं। सादगी का परिचय तो सिर्फ फोटो, फेसबुक, इंस्‍टाग्राम और वायरल होने के लिए छद्म नीयत के तहत किया जाता है।

इस प्रदूषण की पराकाष्‍ठा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि जब कोई प्रदूषण एक परिवेश में आता है तो उससे जुड़े पूरे इकोसिस्‍टम को प्रभावित कर देता है। जैसे कि घातक केमिकल युक्‍त पदार्थों के सेवन से मानव एवं जीवों को नुकसान होता है, वहीं उन जीवों (मछली, चिकन आदि) को खाने से मानव के स्‍वास्‍थ्‍य के साथ खिलवाड़ होता है यहॉं तक कि जान तक चली जाती है। धड़ल्‍ले से बाज़ार में चल रहे इन अनैतिक और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाने वाले पदार्थों का विक्रय खुलेआम हो रहा है जिसकी खिलाफ़त कोई नहीं करता क्‍योंकि उनके सम्‍बंधी किसी ऐसे पद अथवा पहुँच वाले होते हैं जो कानून इस अन्‍याय को पैसों के दम पर जीत लेगें, ऐसा सोचकर आमजन का शोषण करते हैं।

कहने को बहुत कुछ है कि किस प्रकार कुछ कम्‍पनियॉं अनैतिक रूप से जलाशय, नदियॉं आदि नष्‍ट कर दी हैं, सरकार के ही बीच के लोग पर्यावरण की रक्षा इस वजह से न कर पाए क्‍योंकि उनका व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ निहित था। परन्‍तु इस लेख में मैं सामान्‍य बात रखना चाह रहा हूँ कि पर्यावरण संरक्षण एवं उसके संरक्षण के जागरूकता की कमान जिनके हाथ में अक्‍सर होती है वह स्‍वयं पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचा रहे होते हैं और आडम्‍बर दिखाते हुए पर्यावरण हितकारी मानते हैं। इन सबकी वजह से भारत के गरीब और आम जनता के बीच गलत संदेश जाता है और वह पुन: ठगा सा महसूस करता है कि साहब जी ने तो पर्यावरण संरक्षण के बारे में बात किया और स्‍वयं किस कदर पर्यावरण को प्रदूषित करने में अमादा हैं और यह ढीकरा आमजन गरीबों पर फोड़ देते हैं।

लेख पूर्णत: प्रकृति संरक्षण के लिए लिखा गया है, कृपया दिल पर बात न लें। यदि आप पर्यावरण प्रदूषित कर रहे हैं तो आडम्‍बर से हटकर पर्यावरण को संरक्षित करने के उद्देश्‍य से साधारण जिन्‍दगी अपनाएँ। धन्‍यवाद।

Wednesday, March 22, 2023

स्‍टूडेन्‍ट्स के लिए इंटरनेट की ज़रूरत और उपयोगिता

 मानव सभ्‍यता समय के साथ परिवर्तन देखती आयी है। यही परिवर्तन समय के साथ मानव की आवश्‍यकता बन जाती है। आज मानव सभ्‍यता के इंटरनेट की आवश्‍यकता इसकी ज़रूरत बन गयी है। यह ज़रूरत समाज के हर तबके पर असर डालती है, यह बात अलग है कि अभी के वृद्ध हो रहे तबके को इंटरनेट का ज्ञान भले की अपेक्षया कम हो परन्‍तु इंटरनेट के प्रभाव से समाज का यह तबका भी अछूता नहीं रहा है।

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स्‍टूडेन्‍ट्स के लिए इंटरनेट की ज़रूरत और उपयोगिता

20वीं सदी के अन्‍त में इंटरनेट की शुरूआत हुयी, कुछ समय तक इस तक पहुँच चुनिन्‍दा उपक्रम, उद्योग और विभागों तक ही सीमित था, परन्‍तु 21वीं सदी के कुछ वर्षों बाद ही इंटरनेट की पहुँच एवं आवश्‍यकता मानव समाज की एक मूलभूत आवश्‍यकता बन चुकी है। इंटरनेट का असर अब छोटे से छोटे उद्योग से लेकर शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, सेना, वैज्ञानिकता, व्‍यापार आदि क्षेत्रों पर है। एक स्‍टूडेन्‍ट जो स्‍कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहा होता है उसे भी भविष्‍य में कहीं न कहीं कम्‍प्‍यूटर/इंटरनेट की ज़रूरत अवश्‍य ही महसूस होती है। चूँकि भारत में शिक्षा प्रणाली सभी वर्ग और सभी स्‍थान पर एक जैसी नहीं है, इसलिए कम्‍प्‍यूटर/इंटरनेट की शिक्षा और विद्याथियों तक उसकी पहुँच भी एकसमान नहीं है। परन्‍तु विद्यार्थी जीवन के बाद रोजगार के अवसर में कम्‍प्‍यूटर/इंटरनेट का महत्‍व अधिक हो जाता है और यहीं से एक विद्यार्थी के लिए के नींव में इंटरनेट की उपयोगिता का होना स्‍वाभाविक समझा जाता है।

इंटरनेट की पहुँच का सामान्‍य आशय डिजिटल लिटरेसी से भी है, क्‍योंकि बिना कम्‍प्‍यूटर/स्‍मार्ट फोन के इंटरनेट की व्‍याख्‍या कर पाना कठिन होता है। आज यदि इंटरनेट की पहुँच की बात ही जाए तो शहरी क्षेत्र में इसकी पहुँच अधिक जबकि ग्रामीण क्षेत्र में कम है, दूसरी तरफ डिजिटल लिटरेसी का भी अनुपात ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र में अधिक है। इंटरनेट के इस असमान वितरण के पीछे की कई वजह हैं जैसे कि भूगोलीय परिस्थिति, क्षेत्रीय लोगों की इंटरनेट मॉंग जिस वजह से कम्‍पनियॉं इंटरनेट प्रदान करती हैं आदि। इंटरनेट के असमान वितरण की वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में विद्यार्थियों को मिलने वाली शिक्षा में भी बड़ा अंतर होता है, परन्‍तु सरकारों ने समय के साथ इंटरनेट की आवश्‍यकता को समझा है और छात्रों की शिक्षा के लिए फ्री स्‍मार्टफोन और स्‍कूल शिक्षा में कम्‍प्‍यूटर की पढ़ाई के महत्‍व को स्‍थान दिया है।

अब चलिए उन सम्‍भावनाओं की बात करते हैं जो इंटरनेट की मदद से एक स्‍टूडेन्‍ट के लिए सम्‍भव हो जाती हैं। हाल ही में कोविड-19 की वजह से मानव समाज ने दूर रहकर भी एक होने का एहसास इंटरनेट की मदद से किया है, चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र रहा हो या चाहे अन्‍य क्षेत्र। विद्यार्थियों ने ऑनलाईन क्‍लासेज के माध्‍यम से पढ़ाई ज़ारी रखी तो दूसरी तरफ वर्क फ्रॉम होम अथवा रिमोट जॉब ने घर बैठे काम करने का अद्भुत एहसास कराया। जब किसी स्‍टूडेंट के पास इंटरनेट तक पहुँच होती है तो वह अपने मनमुताबिक ऑनलाईन पढ़ाई कर सकता है, इंटरनेट से वेब सर्फ करके अथवा यूट्यूब वीडियोज के माध्‍यम से। स्‍कूली शिक्षा के दौरान एक विद्यार्थी इंटरनेट का प्रयोग करके ऑनलाईन कोचिंग के माध्‍यम से घर से ही ट्यूशन पढ़ सकता है अथवा स्‍कूल पाठ्यक्रम में यदि किसी समस्‍या का समाधान ढूँढ़ना हो तो वह इंटरनेट की मदद लेकर रोचक तरीके से समस्‍या का हल निकाल सकता है। मेरा मानना है कि स्‍टूडेंट शब्‍द सिर्फ स्‍कूल अथवा कॉलेज तक नहीं सीमित होना चाहिए, बल्कि इन एकेडमिक के बाद की भी जिन्‍दगी स्‍टूडेंट के जैसी ही होती है। पहले समय में जब स्‍टूडेन्‍ट कोई कोर्स कर रहा होता था तो उसके पास आगे क्‍या करना है इस बात की कम समझ होती थी, और शिक्षकों अथवा बुजुर्गों से मिलने वाला गाईडेन्‍स भी सीमित दायरे का होता था। परन्‍तु आज एक स्‍टूडेंट के पास उन पारम्‍परिक रोजगार को चुनने के अलावा असीमित और विकल्‍प मौजूद हैं जिसकी शिक्षा इंटरनेट के माध्‍यम से प्राप्‍त की जा सकती है, जैसे फ्रीलांसिंग, यूट्यूबर, ब्‍लॉगर आदि।

चलिए एक रोचक घटना की चर्चा करते हैं। मध्‍यप्रदेश के विद्यालयों में इसी वर्ष 2023 के माह जनवरी में करियर गाईडेन्‍स नाम से एक दिवसीय कार्यक्रम रखा गया था जिसका उद्देश्‍य स्‍कूली विद्यार्थियों को आगे क्‍या करना है, रोजगारोन्‍मुखी मार्गदर्शन प्रदान करना था। उस अवसर पर मुझे भी एक मार्गदर्शक के तौर पर एक विद्यालय द्वारा आमंत्रित किया गया था। मैं एक शासकीय सेवक हूँ एवं यूट्यूबर-ब्‍लॉगर भी हूँ। वहॉं मेरे अलावा कई अन्‍य वक्‍ता भी मौजूद रहे, सभी की उम्र मुझसे बहुत अधिक थी, मैं महज अभी 25 वर्ष का हूँ। एक बुजुर्ग शिक्षक जिनकी उम्र 60 के करीब हो रही होगी उन्‍होंने विद्यार्थियों को कुछ इस प्रकार करियर का मतलब समझाया कि – बच्‍चों जो पुस्‍तक आपके कक्षा में लगती है उसे लो और एक बन्‍द कमरे में खुद को बन्‍द करके पुस्‍तक को रट डालो, पुस्‍तक के बाहर का कोई ज्ञान सही नहीं रहेगा और बाद में एक सरकारी नौकरी करो नहीं तो कोई भविष्‍य नहीं होगा। दूसरी तरफ कुछ औरों ने भी यही घुमा-फिराकर बातें रखीं, परन्‍तु बदलते समय के साथ स्‍टूडेंट्स की ज़रूरत को कुछ लोगों ने ही आगे लाकर रखा। मैंने भी मार्गदर्शन दिया, अपने स्‍तर से, मैंने स्‍टूडेंट्स को समझाया कि करियर का अर्थ आपकी पसंद के विषय से है चाहे वह आपके विद्यालय की कक्षा का एक विषय हो अथवा नहीं, आप विद्यालय में जो विषय पढ़ते हैं दुनिया में आपके रूचि के अन्‍य विषय भी हैं। ज़रूरी नहीं कि यदि आप इन शैक्षणिक विषयों में कमजोर हों तो आपकी सफलता के रास्‍ते बन्‍द हो गये हैं, बल्कि इंटरनेट की भी एक दुनिया है जहॉ पर रोजगार अथवा अधिक सार्थक शब्‍द होगा उपक्रम के अनेक रास्‍ते और विषय हैं। मैंने उन्‍हें अपनी छोटी सी सफलता की कहानी भी बतायी कि किस प्रकार में यूट्यूब और ब्‍लॉंगर से आसानी से रूपये कमा पा रहा हूँ और यह एक सफलता की सीढ़ी के रूप में काम कर रहा है, इसके अलावा फ्रीलांसिंग पर मौजूद अन्‍य प्रोफाईल जैसे प्रोग्रामर, वाईस आर्टिस्‍ट, कंटेंट राईटर, ग्राफिक डिजाईनर आदि के बारे में भी समझाया।

आज आये दिन हम यह सुनते हैं कि इंटरनेट की मदद से एक स्‍टूडेंट ने नई तकनीकि सीख ली है, अथवा इंटरनेट की मदद से किसी ने घर बैठे सरकारी-प्रायवेट परीक्षाओं को पास कर लिया है। इंटरनेट की मदद से स्‍टूडेंट कृषि की नई प्रणाली को अपनाकर सफलता के नये आयाम रच दिया है। इंटरनेट की आवश्‍यकता आज स्‍टूडेंट के प्रारम्भिक जीवन से लेकर लगातार ताउम्र बने रहने वाली है। यही वजह है कि सरकार ने भी नई शिक्षा नीति में इंटरनेट के महत्‍व को समझा है और अकादमिक शिक्षा को ही अंतिम लक्ष्‍य न मानकर प्रैक्टिकल शिक्षा और उपलब्‍ध अवसरों पर अधिक बल दिया है। इंटरनेट की ही वजह से रेगुलर कोर्स और डिस्‍टेंस कोर्स के मध्‍य का संक्रमण ऑनलाईन कोर्स का इजात किया गया है और इसे सरकार ने मान्‍यता भी दिया है। इंटरनेट के बढ़ते प्रारूप को सकारात्‍मक रूप देने का सरकार ने भली-भॉंति प्रयास किया है, आज एक आम विद्यालय/कॉलेज का छात्र भी भारत की महान आईआईटी/आईआईएम की शिक्षा ऑनलाई वीडियो के माध्‍यम से प्राप्‍त कर सकता है साथ ही साथ ऑक्‍सफार्ड जैसी विदेशी उन्‍नत शिक्षा के कोर्सेस भी ऑनलाईन प्राप्‍त किये जा सकते हैं। सही कहा गया है कि यह युग इनफॉरमेशन का है, जिसे आसानी से प्राप्‍त किया जा सकता है।

सरकार और सभ्‍य व्‍यक्तित्‍वों के प्रयास के बाद इंटरनेट की पहुँच और इससे सम्‍बंधित शिक्षा में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। परन्‍तु इंटरनेट की पहुँच अथवा क्‍वालिटी एजुकेशन में आज भी यह अन्‍तर कई रूपों में सामने आया है। शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट की उपयोगिता और ज़रूरत पर अच्‍छी सफलता प्राप्‍त की गई है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में यह काफी निराशाजनक रहा है। दूसरी तरफ हम यह असमानता लैंगिक आधार के साथ-साथ जातिगत आधार पर भी देखते हैं कि महिलाओं में एवं अनुसूचित जाति/जनजातियों में इंटरनेट की पहुँच एवं युटिलाईजेशन अपेक्षया कम हुआ है। इसकी कई सारी वजहें हैं, जिनमें से इनका ग्रामीण परिवेश, भूस्थिति, रूढिवादिता, संसाधनों का समुचित उपयोग न होना भी शामिल है। एक बात यह स्‍पष्‍ट करना चाहूँगा कि ग्रामीण परिवेश में भी शिक्षा का स्‍तर एवं इंटरनेट की पहुँच कुछ स्‍थानों पर बेहतर है एवं आये दिन सुधार हो ही रहा है।

अन्‍य कारणों पर ध्‍यान दिया जाए तो कई ऐसे भी उदाहरण सामने आये हैं जबकि स्‍टूडेंट्स के पास इंटरनेट की आसान सुविधा होने के बाद भी वह ज्‍यादातर उसका इस्‍तेमाल अवांछित काम में करते हैं जैसे कि रील्‍स देखना, कॉमेडी/प्रैंक देखना, फिजूल के इंटरनेट पर मौजूद कंटेट पर फंस जाना, इंटरनेट प्‍लेटफॉर्म पर वर्चुअल दुनिया की तलाश करना आदि। यह एक बहुत बड़ी समस्‍या है, इसकी वजह से करियर निर्माण की बात तो दूर बेरोजगारी, अनएम्‍प्‍लायबिलिटी और आपराधिक गतिविधियों की बढ़ोतरी देखी गई है। कई बार जिम्‍मेदार स्‍टूडेंट्स का सही से मार्गदर्शन नहीं कर पाते तो कही बार स्‍टूडेंट्स समझदार होते हुए भी इंटरनेट की बुरी दुनिया में घिर जाते हैं जिसका परिणाम अंतत: बुरा ही होता है।

निष्‍कर्ष के तौर पर कहा जाए तो इंटरनेट एक स्‍टूडेंट के करियर निर्माण में महत्‍वपूर्व भूमिका निभाता है। इंटरनेट पर ज्ञान के साथ-साथ रोजगार एवं रोजगारसहायक विकल्‍प उपलब्‍ध हैं। परन्‍तु जिस प्रकार हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार इंटरनेट के प्रयोग में भी दो आयाम नज़र आते हैं। स्‍टूडेंट्स को चाहिए कि इंटरनेट से ज्ञानार्जन करें एवं इस पर उपलब्‍ध सकारात्‍मक अवसरों को अपनाऍं न कि समय की बर्बादी और मॉडर्निटी के नाम पर अवांछनीय पहलुओं के जाल में फँसें। सरकार एवं समाज के अच्‍छे व्‍यक्तित्‍व इंटरनेट की पहुँच प्रत्‍येक विद्यार्थी तक बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। कुछ समस्‍याएँ ज़रूर हैं परन्‍तु सबके सकारात्‍मक प्रयास से हम एक डिजिटल भारत के युग में जल्‍द प्रवेश करेंगे।